जगतगुरु स्वामी धीरेंद्राचार्य जी महाराज का जन्म 2 दिसंबर 1978 ( शुक्ल पक्ष ) तृतीय तिथि के दिन दिन शनिवार को बुंदेलखंड के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के जिला जालौन स्थित क्रौंच ऋषि की तपस्थली कहे जाने वाली कोच नगर के एक शनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ महाराज श्री की पूज्य माता श्री निर्मला देवी एवं पिता श्री लक्ष्मण दास नगाइच महाराज श्री की माता निर्मला देवी धार्मिक विचारों की होने के कारण उनका अधिकांश समय भगवान की आराधना में व्यतीत होता था । महाराज श्री के पिता एवं माता जी के धार्मिक प्रगतिशील एवं भगवान में आस्था एवं नर सेवा नारायण सेवा एवं सभी जीवो का जगत से कल्याण व ठाकुर जी के चरित् जुडाव होने वाले रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में सहायता की |
बचपन से ही महाराज जी अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के तो थे ही नटखट भी थे उनके घर में नियम पूर्वक रोज पूजा पाठ होता था धार्मिक प्रवृत्ति के होने के कारण माता निर्मला देवी को रामचरितमानस,श्रीमद् भागवत, गीता आदि की कथा सुनने का बहुत शौक था और कथा सुनने की इतनी प्रेमी थी कि जहां भी आसपास कथा का आयोजन होता पुत्र धीरेंद्र को लेकर पूरी कथा का रसपान स्वयं करती है और महाराज श्री को भी करती।
उनके घर नियमित रूप से भजन कीर्तन होता रहता था परिवार में धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के प्रभाव से बालक धीरेंद्र के मन में बचपन से ही धर्म एवं अध्यात्म के संस्कार गहरे होते गए माता-पिता के संस्कारों और धार्मिक वातावरण होने के कारण पूज्य महाराज श्री के मन में बचपन से ही ईश्वर को जानने और उसे प्राप्त करने की लालसा दिखाई देने लगी थी ईश्वर के बारे में जानने की उत्सुकता में कभी-कभी ऐसे प्रश्न पूछ बैठते थे कि उनके माता-पिता और कथा वाचक पंडित भी चक्कर में पड़ जाते थे 10 वर्ष की आयु में ही महाराज श्री अपने घर को छोड़कर वृंदावन में जाकर निवास करने लगे और संतों एवं ठाकुर जी की सेवा में संलग्न होने लगे थे एवं आश्रम में रहकर अपनी शिक्षा प्राप्त करने लगे थे क्योंकि भगवान राम से अधिक प्रेम होने के कारण महाराज श्री ने चित्रकूट धाम आकर प्रभु श्री राम ने जहां अपने वनवास काल के साढ़े ग्यारह वर्ष व्यतीत किये ऐसे पवित्र (श्री कामदगिरि पर्वत) श्री कामता नाथ मंदिर पवित्र स्थान पर निवास करने लगे एवं आश्रम में ठाकुर सेवा अपने नित्य कर्म में व्यस्त होकर अपने आराध्य प्रभु श्री राम की कथा श्रवण करते एवं समस्त भक्तों को राम नाम की महिमा को बताकर राम जी के चरित्र को अपने जीवन में उतरने के लिए प्रेरित करते कुछ समय व्यतीत होने के बाद पूज्य महाराज श्री के मन में ठाकुर जी की प्रेरणा से विचार आया के प्रभु श्री राम जी की कथा एवं उनके आदर्शों को श्री राम कथा के माध्यम से भारत के कोने-कोने में रह रहे राम जी के प्रेमियों तक पहुंचना है और इसी संकल्प के साथ महाराज श्री ने अपने कदम बढ़ाना शुरू किया अयोध्या की पावन भूमि से इस समय महाराज श्री की आयु 25 वर्ष पूर्ण होते ही महाराज श्री ने पूज्य महावीर दास ब्रह्मचारी जी महाराज से मंत्र दीक्षा ली और अपने सदगुरुदेव भगवान की कृपा से नाम जप के साथ-साथ श्री राम कथा से जनमानस के सूखे पड़े हृदय को राम कथा रूपी गंगा से संचित कर लाखों करोड़ों लोगों को राम कथा से जोड़कर उनके जीवन को कृतार्थ किया।
महाराज श्री अत्यंत ही सरल एवं सीधी भाषा में श्री राम कथा कहते जिससे ग्रामीण अंचल क्षेत्र के लोगों को सरलता से समझ में आ जाए और राम जी के चरित्र से जुड़ने में आसानी हो इसी क्रम में 6 मार्च (स्वाति नक्षत्र) सन 2018 सभी तीर्थ से पधारे महात्माओं एवं धर्माचार्य व संतों की उपस्थिति में आघ जगद्गुरु रामानंदाचार्य भगवान के द्वारा स्थापित 52 द्वारों की परंपरा में से एक (श्री हनुमंत द्वारा) का द्वारा आचार्य घोषित किया गया जिसकी घोषणा मुख्य रूप से वर्तमान में जगतगुरु रामानंदाचार्य श्री कामदगिरी पीठाधीश्वर स्वामी श्री रामस्वरूप आचार्य जी महाराज ने की एवं महाराज श्री को दंड दीक्षा प्रदान की अब महाराज श्री को संतो के द्वारा सनातन धर्म के बहुत ही अहम पद पर पदस्थ कर दिया गया था जिसके बाद लोग उन्हें जगतगुरु रामानंदाचार्य जी भगवान के परंपरा अनुसार श्री हनुमत द्वार का द्वाराचार्य के रूप में देखने लगे थे। और अब महाराज श्री को जगतगुरु हनुमत द्वाराचार्य की उपाधि से अलंकृत कर दिया गया था इसके बाद उनका पूरा नाम अनंत श्री विभूषित हनुमत द्वारा पीठाधीश्वर जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी श्री धीरेंद्राचार्य जी महाराज के नाम से प्रचलित हुई इसी के साथ महाराज श्री ने और भी अनेक संकल्प लिए गौ माता की रक्षा एवं गो हत्या पर रोक संतों की सेवा दीन हिनो की सेवा एवं नर सेवा में ही नारायण सेवा का दर्शन किया और प्रकृति संरक्षण के लिए भी पूज्य महाराज श्री ने अथक प्रयास किया|